Sources of ancient Indian history in Hindi : प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रमुख स्त्रोत

परीक्षा में पूछे जाने वाले Sources of ancient Indian history in Hindi : प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रमुख स्त्रोत के बारे में पूरी जानकारी

Sources of ancient Indian history in Hindi  : इस पोस्ट में हम प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के प्रमुख स्त्रोतों के बारे में गहन अध्ययन करेंगे. इस पोस्ट में मुख्यतः परीक्षा उपयोगी तथ्य शामिल किये गए है.

Sources of ancient Indian history in Hindi  प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रमुख स्त्रोत



 Sources of ancient Indian history in Hindi : प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रमुख स्त्रोत : 

  1. पुरातात्विक
  2. साहित्यिक
  3. विदेशी यात्रियों के विवरण


1) पुरातात्विक स्त्रोत(Archaeological sources) 

यह स्त्रोत Sources of ancient Indian history [ प्राचीन भारतीय इतिहास ] को जानने के लिए सबसे ज्यादा प्रामाणिक है।

Sources of ancient Indian history पुरातात्त्विक स्त्रोत के अंतर्गत अभिलेख , मुद्राएं , स्मारक एवं घर(भवन) , मूर्तिकला ,चित्रकला ,अवशेष आदि का वर्णन किया जाता है।

देशी अभिलेख 

सबसे प्राचीन अभिलेख जो पढ़े जा चुके है, अशोक के है, जिनकी भाषा "प्राकृत(Prakrit)" है।

मास्की एवं गुर्जरा, से प्राप्त अभिलेख में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख है। राजा अशोक का उल्लेख "प्रियदर्शी(Priyadarshi)" नाम से किया गया है।

और आप को बता दें कि प्रियदर्शी का अर्थ होता है 'देवताओं का प्रिय' । अशोक अर्थात प्रियदर्शी के अधिकतर अभिलेख 'ब्राह्मी लिपि' में हैं। आपको बता दें कि ब्राह्मी लिपि बायें से दायें(Left to Right) लिखी जाती थी।

अशोक के कुछ अभिलेख खरोष्ठी (Kharosthi )लिपि में है ,और खरोष्ठी लिपि दायें से बायें (Right to Left)लिखी जाती थी। मास्की एवं गुर्जरा मध्य प्रदेश में हैं। सबसे पहले  'भारतवर्ष' का उल्लेख कलिंग नरेश खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख से प्राप्त होता है।

सती प्रथा के प्रचलन होने का पहला साक्ष्य 510 ई० के एरण अभिलेख (सेनापति भानू गुप्त) से प्राप्त होती है।

विदेशी अभिलेख

सबसे प्राचीन अभिलेख , मध्य एशिया के बोगजकोई(Boghazkoi) से प्राप्त अभिलेख को माना गया है।

इस अभिलेख में हिती नरेश सप्पीलुल्युमा तथा मितन्नी नरेश मतिवाजा के बीच एक संधि का उल्लेख है।

मुद्रा (Coins)

Sources of ancient Indian history के अंतर्गत मुद्रा(Coins) का उल्लेख भी किया जाना चाहिए । प्राचीनतम सिक्कों को आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के (Punch Marked Coins) कहा जाता है। ग्रंथो में इन्हें शतमान , पुराण,धरण, कार्षापण इत्यादि नामों से भी पुकारा गया है। अभी तक प्राप्त आहत सिक्कों(पंचमार्क) में अधिकांशतः चाँदी के टुकड़े है। 


अगर बात करें सिक्को पर लेख लिखवाने की तो सिक्कों पर लेख लिखवाने का प्रचलन सबसे पहले यवन शासकों ने किया। कनिष्क, बौद्ध धर्म के अनुयायी थे इसका प्रमाण हमें कनिष्क द्वारा जारी किये गए सिक्कों से ही चलता है। इन सब बातों से आप को पता चल ही गया होगा कि [Sources of ancient Indian history] प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के लिए मुद्रा की भूमिका कितनी अहम है।

2) साहित्यिक स्त्रोत (Literary sources of ancient Indian history in Hindi)

[Sources of ancient Indian history in Hindi]

साहित्यिक स्त्रोत के अंतर्गत मुख्यतः दो प्रकार के साहित्य का उल्लेख है।

  1. धार्मिक साहित्य
  2. लौकिक साहित्य

1) धार्मिक साहित्य(Religious literature)  

धार्मिक साहित्य के अंतर्गत ब्राह्मण तथा ब्राह्मणोत्तर ग्रंथो की चर्चा की जा सकती है। अगर बात करें ब्राह्मण ग्रंथो की तो उसके अंतर्गत वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, तथा स्मृति ग्रंथ आते हैं। तथा ब्राह्मणोत्तर ग्रंथो के अंतर्गत बौद्ध साहित्य तथा जैन साहित्य से सम्बंधित रचनाओं का उल्लेख किया जाता है।

ब्राह्मण तथा ब्राह्मणोत्तर ग्रंथो व साहित्य के बारे में विस्तृत जानकारी हम आने वाले पोस्ट में करेंगें

कुछ विद्वान रामायण तथा महाभारत को धार्मिक साहित्य से सम्बंधित मानते है तो कुछ इन्हें लौकिक (धर्मेत्तर) साहित्य से सम्बंधित बताते है।

2) लौकिक साहित्य 

कौटिल्य(Kautilya) (अन्य नाम : चाणक्य (Chanakya)) द्वारा रचित अर्थशास्त्र से मौर्यकालीन इतिहास एवं उनके शासन व्यवस्था की जानकारी हमें विस्तार से प्राप्त होती है।वैसे देखा जाये तो गार्गीसंहिता(Gargi samhita) एक ज्योतिष ग्रंथ है परंतु इस ग्रन्थ में भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है। जिससे हमें अपने भारतीय इतिहास को जानने में काफी हद तक मदद मिलती है।

लौकिक साहित्य के अंतर्गत ऐतिहासिक और अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रंथो तथा जीवनियों का उल्लेख किया गया है।

ऐतिहासिक रचनाओं  में सर्वाधिक महत्व कश्मीरी कवि कल्हण द्वारा विरचित राजतरंगिणी(Rajatarangini) का है।

'राजतरंगिणी' की रचना कश्मीर के राजा जयसिंह (1127-1159 ई०) के काल में की गयी थी। जिसमें 8 तरंगों में कश्मीर का 12वीं शदी तक का इतिहास वर्णित है। राजतरंगिणी(Rajatarangini) संस्कृत भाषा में ऐतिहासिक घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रथम प्रयास है।

अर्द्ध-ऐतिहासिक रचनाओं  में पाणिनि की अष्टाध्यायी , कात्यायन का वार्तिका , गार्गीसंहिता , पतंजलि का महाभाष्य, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस तथा कालिदास द्वारा कृत मालविकाग्निमित्र आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

ऐतिहासिक जीवनियों में अश्वघोष के बुद्धचरित , वाणभट्ट का हर्षचरित, वाक्पति का गौड़वहो, विल्हण का विक्रमांकदेवचरित , पद्मगुप्त का नवसाहशांकचरित , जयानककृत पृथ्वीराज विजय इत्यादि उल्लेखनीय है।


 

3) विदेशी यात्रियों का विवरण 

[Sources of ancient Indian history]

 

विदेशी यात्रियों के विवरण साहित्यिक साक्ष्य के अंतर्गत आते हैं। इनके विवरण से तत्कालीन सामाजिक एवं राजनितिक व्यवस्था का पता चलता है। विदेशी यात्रियों के विवरण को 3 भागों में बांटा जा सकता है।

  1. यूनान और रोम के लिखकों का विवरण ।
  2. चीनी यात्रियों के वृतांत ।
  3. अरबी यात्रियों के वृतांत ।

"(परीक्षा में अधिकांशतः प्रश्न इसी  topic से पूछे जाते है इसलिए इसे अच्छे से व 2-3 बार जरूर पढ़ें)"


 1. यूनान एवं रोम के लेखकों का विवरण

हेरोडोट्स :  हेरोडोट्स को इतिहास का पिता कहा जाता है। इन्होंने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत - फारस के सम्बन्ध का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है।

मेगास्थनीज(Megasthenes) : यह सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। मेगास्थनीज(Megasthenes) ने अपने ग्रन्थ 'इण्डिका(Indica)' ने मौर्य युग के समाज एवं संस्कृति के विषय में लिखा है। मूल किताब अब खो गई है।

डायोनिसियस(Dionysius) : डायोनिसियस(Dionysius) मिस्त्र के राजा टॉलमी द्वितीय फिलेडेल्फस का राजदूत था तथा यह अशोक(Ashok) के दरबार में आया था।

डाइमेकस : यह सीरियन नरेश एन्टियोकस प्रथम का राजदूत था , जो बिंदुसार के दरबार में आया था।

टॉलमी : टॉलमी ने दूसरी शताब्दी के आस-पास लगभग 150ई० 'भूगोल' नामक एक ग्रन्थ की रचना की थी।

प्लिनी : इन्होंने 'नेचुरल हिस्टोरिका' नामक ग्रन्थ की रचना प्रथम शताब्दी के लगभग की थी ।

इन्होंने भारतीय पशुओं, पेड़-पौधे , खनिज पदार्थ आदि का विस्तृत विवरण अपने ग्रन्थ में किया है ।

2. चीनी यात्रियों का वृत्तांत

भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में जिन चीनी यात्रियों के विवरण विशेष उपयोगी रहे उनके नाम निम्नवत है।

फाह्यान(Faxian) : फाह्यान(Faxian) गुप्त वंश के राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375-415 ई) के दरबार में भारत आया था। इसने अपने विवरण में मध्यदेश के समाज एवं संस्कृति का वर्णन किया है। जिसमें मध्यदेश की जनता को 'सुखी एवं समृद्ध' बताया है।

सुंगयुन(Song Yun) : यह 518 ई में भारत आया था। इसने अपने 3 वर्षों की यात्रा में बौद्ध ग्रंथो की प्रतियां एकत्रित की।

ह्वेनसांग(Xuanzang) : ह्वेनसांग(Xuanzang) को 'युवानच्वांग' के नाम से भी जाना जाता है। यह हर्षवर्द्धन के समय 629 ई. के लगभग भारत आया था , जो यहाँ 16 वर्षों तक रहा था। ह्वेनसांग(Xuanzang) की जीवनी ह्वीली ने लिखी थी । ह्वीली , ह्वेनसांग(Xuanzang) का मित्र था।

इत्सिंग( i-tsing) : इत्सिंग( i-tsing) सातवीं शताब्दी के अंत में भारत आया था। इत्सिंग(i-tsing) ने अपने विवरण में नालन्दा विश्व विद्यालय तथा अपने समय के भारतीय दशाओं का वर्णन किया है।

3. अरब यात्रियों के वृत्तांत

अरबी लेखकों में अल बिलादुरी, सुलेमान,अलबरूनी , अल मसूदी, हसन निज़ाम, फरिश्ता, निजामुद्दीन इत्यादि मुस्लमान लेखक है , जिनकी कृतियों से भारतीय इतिहास विषयक महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

अलबरूनी(Al-Biruni) : अलबरूनी का पूरा नाम अबुरेहान मुहम्मद इब्द अहमद अलबरूनी था। अलबरूनी का जन्म 973 ई. में ख्वारिज्म (खीवा) में हुआ था। अलबरूनी महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। अलबरूनी अरबी, फ़ारसी, एवं संस्कृत भाषाओं का अच्छा ज्ञाता था।

अलमसूदी : अलमसूदी ने अपनी क़िताब 'मुरूरज जहब' में तत्कालीन भारतीय समाज का सजीव चित्रण किया है।

सुलेमान(Sulaiman or Soleiman al-Tajir ) : सुलेमान के विवरण से प्रतिहार एवं पाल राजाओं के विषय में जानकारी में मिलती है।

मीर मुहम्मद मसूम(Meer Muhammad Masum ): मीर मुहम्मद मसूम के तारीख -ए-हिन्द से सिन्ध देश के इतिहास तथा मुहम्मद बिन कासिम की सफलताओं की जानकारी प्राप्त होती है।


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